Wednesday, February 8, 2023
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ऑपरेशन लोटस और लोकतंत्र

अजीत द्विवेदी
आमतौर पर यह माना जाता है कि ‘ऑपरेशन लोटस’ का जुमला भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व नरेंद्र मोदी और अमित शाह के हाथ में आने के बाद अस्तित्व में आया है। लेकिन असल में इसकी पहली चर्चा 2008 में हुई थी, जब बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक में सरकार बनाई थी। राष्ट्रपति शासन के बाद उन्होंने अल्पमत सरकार की कमान संभाली थी। तब प्रायोगिक तौर पर ‘ऑपरेशन लोटस’ की शुरुआत हुई थी। उन्होंने एक-एक करके विपक्षी पार्टियों के विधायकों का इस्तीफा कराया था और उपचुनाव में उनकी जीत सुनिश्चित करके अपनी सरकार का बहुमत बनाया था। 2014 के बाद इस फॉर्मूले का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। कई राज्यों में चुनाव हारने के बाद भी भाजपा इस फॉर्मूले के सहारे सत्ता में आई। पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश और कर्नाटक तक में इसका कामयाबी से इस्तेमाल हुआ। कुछ जगहों पर यह अभियान विफल भी हुआ लेकिन इसकी सफलता का अनुपात ज्यादा है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पहले सरकार बनाने की एकमात्र शर्त यह थी कि जो पार्टी चुनाव जीतेगी, विधायकों का बहुमत हासिल करेगी वह सरकार बनाएगी। बाद में जब गठबंधन का दौर शुरू हुआ तो चुनाव पूर्व और चुनाव बाद गठबंधन होने लगे और यह नियम स्थापित हुआ कि, जिस चुनाव पूर्व या चुनाव बाद गठबंधन को बहुमत हासिल होगा वह सरकार बनाएगा। अब एक नया दौर शुरू हुआ है, जिसमें चुनाव जीत कर स्पष्ट बहुमत हासिल करने वाली पार्टी की सरकार गिर जाती है, चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी भी सरकार नहीं बना पाती है और चुनाव पूर्व या बाद के गठबंधन वाली सरकारें भी गिर जाती हैं। यह भारतीय लोकतंत्र में ‘ऑपरेशन लोटस’ का काल है। तर्क के लिए कुछ लोग बताते हैं कि कांग्रेस के जमाने में भी भजनलाल ने पूरी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया था और रातों रात सरकार बदल गई थी। लेकिन वह एक आपवादिक घटना थी। उस समय दलबदल के कानून नहीं थे और इस बात का भी कोई सबूत नहीं है कि तब की कांग्रेस की केंद्र सरकार ने उस दलबदल को डिजाइन किया था।

बहरहाल, ‘ऑपरेशन लोटस’ के इस दौर में लोकतंत्र सिर्फ जनादेश का मोहताज नहीं है। अब सिर्फ जनता के वोट से सरकार नहीं बनती है। अब वोट की बजाय फॉर्मूलों से सरकार बनती है। सरकार बनाने के एक से ज्यादा फॉर्मूलों का आविष्कार हो गया है। हैरानी है कि अभी तक भारतीय जनता पार्टी ने लोकतंत्र के इस नए स्वरूप और सरकार बनाने के नए फॉर्मूलों का पेटेंट क्यों नहीं कराया है! बहरहाल, सरकार बनाने के हर नए फॉर्मूले में कुछ कुछ एलीमेंट्स एक जैसे हैं और उनके रिएक्शन भी समान हैं लेकिन हर बार कुछ नया एलीमेंट इसमें जोड़ा जाता है, जिससे इसकी सफलता का प्रतिशत बढ़ जाता है। अभी तक का सबसे सफल फॉर्मूला वहीं है, जिसका आविष्कार बीएस येदियुरप्पा ने किया था। यानी दूसरी पार्टियों के विधायकों का इस्तीफा करा कर उपचुनाव कराना और उनकी मदद से अपनी सरकार बनाना। यह फॉर्मूला बहुत सफलता के साथ 2019 में कर्नाटक में और 2020 में मध्य प्रदेश में अपनाया गया। कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस ने मई 2018 में हुए चुनाव के बाद गठबंधन करके सरकार बनाई थी। जुलाई 2019 में कांग्रेस और जेडीएस के कुछ विधायक बेंगलुरू से निकल कर मुंबई पहुंच गए थे, जहां उस समय भाजपा की सरकार थी। बाद में उन विधायकों ने इस्तीफा दिया, जिससे एचडी कुमारस्वामी की सरकार अल्पमत में आ गई और राज्यपाल ने भाजपा के बीएस येदियुरप्पा को शपथ दिला दी।

कर्नाटक से उलट मध्य प्रदेश में तो कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी। तीन चुनावों में लगातार हारने के बाद कांग्रेस ने 2018 के चुनाव में भाजपा को हराया था। उसे एक ही सीट का बहुमत मिला था लेकिन जनादेश बहुत स्पष्ट था। वहां भी कोरोना महामारी के दौरान 2020 में कर्नाटक की कहानी दोहराई गई। मध्य प्रदेश के विधायक भोपाल से निकल कर बेंगलुरू पहुंच गए थे, जहां ‘ऑपरेशन लोटस’ के जरिए बनी भाजपा सरकार चल रही थी। बाद की कहानी इतिहास है। कांग्रेस छोडऩे वाले सभी विधायकों ने इस्तीफा दे दिया, जिससे कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई और फिर राज्यपाल ने भाजपा के शिवराज सिंह चौहान को शपथ दिला दी, जिसमें कांग्रेस छोडऩे वाले लगभग सभी विधायकों को मंत्री बना दिया गया।

‘ऑपरेशन लोटस’ के इस पारंपरिक फॉर्मूले से अलग एक फॉर्मूला अरुणाचल प्रदेश में आजमाया गया था, जहां कांग्रेस के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने सितंबर 2016 में पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल बना कर अपनी सरकार बनाई और तीन महीने बाद दिसंबर 2016 में 43 विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। इस तरह दो विधायकों वाली पार्टी भाजपा 45 विधायकों वाली सत्तारूढ़ पार्टी में बदल गई। एक तीसरा फॉर्मूला गोवा में आजमाया गया, जहां 2017 के चुनाव में 17 सीटें जीत कर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। भाजपा बुरी तरह से चुनाव हारी थी 22 सीटों से कम होकर उसके विधायकों की संख्या 12 रह गई थी। फिर भी दूसरी पार्टियों के समर्थन और तोड़-फोड़ से भाजपा से अपनी सरकार बना ली थी। उसी चुनाव में यह फॉर्मूला मणिपुर में भी सफलतापूर्वक आजमाया गया था। राजस्थान में जुलाई 2020 में ‘ऑपरेशन लोटस’ की कोशिश हुई थी लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के जादू के आगे ऑपरेशन विफल हो गया था।
अब देखना दिलचस्प है कि महाराष्ट्र में कौन सा फॉर्मूला अपनाया जाता है। महाराष्ट्र में भाजपा ने 2019 में एक बिल्कुल नया फॉर्मूला आजमाया था लेकिन कामयाबी नहीं मिली थी। उस फॉर्मूले के तहत शरद पवार के भतीजे अजित पवार को अपनी ओर मिला कर मुंह अंधेरे में राज्यपाल से देवेंद्र फडऩवीस को मुख्यमंत्री और अजित पवार को उप मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई गई थी। लेकिन वह फॉर्मूला फेल हो गया था। महाराष्ट्र में कर्नाटक और मध्य प्रदेश वाला फॉर्मूला आजमाने की स्थिति नहीं है क्योंकि बड़ी संख्या में विधायकों से इस्तीफा कराना होगा और तब भी भाजपा की सरकार बनने की गारंटी नहीं होगी। इसलिए वहां अरुणाचल प्रदेश वाले फॉर्मूले पर अमल किया जा रहा है। शिव सेना से अलग एक गुट बनाया जा रहा है, जो बाद में भाजपा में शामिल हो सकता है।

अलग अलग फॉर्मूलों से सरकार बनाने के जितने प्रयोग भाजपा ने किए हैं उनमें कुछ एलीमेंट्स एक जैसे हैं। जैसे केंद्रीय एजेंसियों ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई। धनबल की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। मलाईदार पद का लालच भी काफी काम आया और सबसे अहम राजभवनों की भूमिका रही। कुल मिला कर लोकतंत्र के सबसे जरूरी एलीमेंट यानी जनता के वोट की सबसे कम भूमिका रही। यह भी कह सकते हैं कि जनता ने तो भाजपा को हरा दिया या बहुमत से दूर रखा, लेकिन दूसरे गैर लोकतांत्रिक एलीमेंट्स के इस्तेमाल से भाजपा ने अपनी सरकार बनाई। लोकतंत्र का यह दौर बेहद चिंताजनक है। इस समय जो पार्टियां शिव सेना की दुर्दशा पर चुप हैं या मजे ले रही हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि किसी दिन उनका भी ऐसा समय आ सकता है।

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